आज हम ज्ञान और तकनीकी के हर क्षेत्र में पीछे हैं। ओलंपिक पदक तालिका की छाया में खड़े होकर विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि हम हर 'खेल' भी में पीछे हैं। अफसोस की हम क्रिकेट में भी ज्यादा आगे नहीं हैं। जबकि भारत में क्रिकेट एक खेल से आगे बढ़ कर एक कल्चर बन चुका है। इसके प्रभाव को देखते हुए इस क्रिकेट कल्चर के विश्लेषण की जरूरत है।
इस खेल के पीछे के 'खेल' को समझने के लिए कोई विशेष प्रयास करने की जरूरत नहीं है। सभी क्रिकेट बोर्डों की कलई खुली हुई है। जिसे झांकना हो झांक सकता है। जिसने अपनी स्वेच्छा से आँखे मींच रखी हो उसे जबरदस्ती कोई चीज दिखाई नहीं जा सकती। क्रिकेट अकादमियों पर राजनेताओं का कब्जा, इस खेल से उपार्जित अकूत सम्पत्ति, इस खेल पर कब्जे को लेकर होने वाले विवाद इसकी असलियत जाहिर करते हैं। तुर्रा यह कि लगभग राष्ट्रीय खेल बन चुके इस गेम पर सरकार को कोई सीधा नियंत्रण नहीं है। इससे होने वाली आय सीधे सरकार को नहीं प्राप्त होती है। जाहिर है कि जो आय सीधे सरकार की नहीं होती वो जनता के लिए बेकार की होती है। सबसे बड़ी बात और सबसे खतरनाक भी, क्रिकेट के मसीहा समझे जाने वाले तमाम खिलाड़ियों की भूमिका खेल के मैदान से ही शुरू होती है और इस मैदान पर ही खत्म हो जाती है। क्रिकेट मैदान के हिरो मैदान से बाहर क्रिकेट मैनेजमेंट की दुनिया में जीरो बना दिए जाते हैं। क्रिकेट की मार्केट का असल खिलाड़ी कौन हैं इसे पब्लिक भी जानती है। ये असल खिलाड़ी मैदान के बाहर कौन सा खेल खेलते हैं पब्लिक इसे भी जानती है। (क्योंकि पब्लिक सब जानती है)
गौरतलब है कि क्रिकेट मार्केट के असल खिलाड़ी खुद अपने व्यक्तिगत जीवन में क्रिकेट नहीं खेलते। इनमें से ज्यादातर गोल्फ/रग्बी/लान टेनिस खेलते हैं। जरूरी नहीं कि ये क्रिकेट देखते भी हों। ये लान टेनिस या यूरोपियन फुटबाल देखते हैं। ये क्रिकेट क्यों नहीं खेलते ? ये क्रिकेट कम क्यों देखते हैं ? कारण स्पष्ट है। क्रिकेट मूलतः मध्यवर्गीय खेल है। कुछ निम्न वर्गीय अपने को हाइ कल्चर से जोड़ने के लिए इसे खेल लेते हैं। लेकिन वो टेनिस बाल क्रिकेट होता है। जिसे खेलकर आप खिलाड़ी तो कत्तई नहीं बन सकते। स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति कौन से खेल खेलता-खिलाता है इससे उसकी वर्गीय स्थिति जानी जा सकती है।
असल (अंतर्राष्ट्रीय) क्रिकेट के लिए बाल,बैट,ग्लब्स,पैड की जरूरत होती है। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिए जरूरी इन सामानों की कीमत हजार रूपए से शुरू होती है। अर्जुनसेन गुप्ता की खालिश सरकारी रिर्पोट के अनुसार इस भारत देश के सत्तर प्रतिशत निवासी छह सौ रुपए महीना से कम में गुजार करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट क्या वो खाक खेलेंगे ! इतना ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिए 'पिच' की भी जरूरत होती है। किसी भी कमेटी से जाँच करा लीजिए, इस देश में निन्यानबे प्रतिशत से ज्यादा जनता को क्रिकेट 'पिच' के दर्शन नहीं होते हैं। जिन्होने पिच नहीं देखा वो क्रिकेटर क्या खाक बनेंगे ! जाहिर है कि इस देश की कम से कम नब्बे प्रतिशत जनसंख्या अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की स्थिति में नहीं होती है। इसके बावजूद यह कुछ लोगों को राष्ट्रीय खेल प्रतीत होता है।
असल (अंतर्राष्ट्रीय) क्रिकेट के लिए बाल,बैट,ग्लब्स,पैड की जरूरत होती है। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिए जरूरी इन सामानों की कीमत हजार रूपए से शुरू होती है। अर्जुनसेन गुप्ता की खालिश सरकारी रिर्पोट के अनुसार इस भारत देश के सत्तर प्रतिशत निवासी छह सौ रुपए महीना से कम में गुजार करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट क्या वो खाक खेलेंगे ! इतना ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिए 'पिच' की भी जरूरत होती है। किसी भी कमेटी से जाँच करा लीजिए, इस देश में निन्यानबे प्रतिशत से ज्यादा जनता को क्रिकेट 'पिच' के दर्शन नहीं होते हैं। जिन्होने पिच नहीं देखा वो क्रिकेटर क्या खाक बनेंगे ! जाहिर है कि इस देश की कम से कम नब्बे प्रतिशत जनसंख्या अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने की स्थिति में नहीं होती है। इसके बावजूद यह कुछ लोगों को राष्ट्रीय खेल प्रतीत होता है।
ठीक है, जो क्रिकेट खेल नहीं सकते वो देख तो सकते हैं। हालाँकि क्रिकेट देखने के लिए एक टीवी चाहिए। उस टीवी में केबल कनेक्शन या सेट टाप बाक्स होना चाहिए। क्योंकि मुफ्त में सिर्फ दूर का दर्शन मिलता है। जिनके पास ये ताम-झाम लेने के लिए पैसा हो उन्हें भी किसी शहर या कस्बे में घर होना चाहिए। क्योंकि केबल की पहुँच अभी भी गाँव-गाँव तक नहीं हुई है। शहरों और कस्बे में लोग सार्वजनिक स्थानों पर झुण्ड लगाए टीवी देखते देखे जा सकते हैं। क्रिकेट कल्चर में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए उनके संघर्ष की मैं सराहना करता हूँ। लेकिन यह देखना-दिखाना का गणित भी इतना सरल नहीं है। हम जानते हैं कि 'जनमत पर अपरोक्ष नियंत्रण' का सिद्धांत है,कामगार मध्यवर्ग को मनोरंजन के इतने साधन उपलब्ध करावाओ की वो अपने काम और उसके परिणाम के बारे में कोई विचार नहीं करे। मशीन की तरह आफिस में जाकर जो कहा जाए वो काम करे और घर आकर भरपूर मनोरंजन में व्यस्त हो जाए। उसने क्या किया,क्यों किया,किसके लिए किया, उसके किए का परिणाम क्या होगा आदि-इत्यादि प्रश्नों को वह 'मनोरंजन' की गोद में सिर रख कर भूला दे। भारत में क्रिकेट इसी 'जनमत पर अपरोक्ष नियंत्रण सिद्धांत' को अमल में लाने का सबसे पुख्ता औजार बना हुआ है। यह खेल अमीरों के लिए अकूत सम्पत्ति बनाने की मशीन है। इसके सहारे मध्यवर्ग को गंभीर मुद्दों से दूर रखा जाता है। साथ ही यह देश की बड़ी युवा जनसंख्या के समय और उर्जा को बर्बाद करने की एक बड़ी वजह भी है। इतना ही नहीं इसने दूसरे सभी खेलो को अवसाद की स्थिति में पहुंचा दिया है।
एक अरब बीस करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या में क्लीनर/चपरासी/ड्राइवर जैसी कम तनख्वाह वाले नौकरीपेशा अभिभावकों के एकाध बच्चे जब इस खेल में आ जाते हैं तो इसका खूब प्रोपगैण्डा किया जाता है। ऐसा नहीं कि इन बच्चों का सेलेक्शन किसी सदिच्छा से किया जाता है। यह इस खेल को चलाने के लिए क्रिकेट के आकाओं की मजबूरी होती है। अच्छे करतबबाज खेल को जिंदा रखने की मजबूरी होते हैं। लेकिन अपनी इस मजबूरी को दरियादिली के रूप में प्रचारित करके जनता की सहानुभूति बटोरी जाती है। सपने बेचे जाते हैं। और बहुत बारीक चालाकी से जनता को ठगा जाता है। मेरी कुल जमा समझ यही कहती है कि इस क्रिकेट कल्चर से लाभ कम नुकसान ज्यादा है।
1 टिप्पणियाँ:
क्रिकेट में मैच फिक्सिंग के पश्चात एक समय ऐसा आया था कि इस खेल से लोगो की आस्था डगमगाने लगी थी लेकिन उसी दौर मे इसे पुन: महिमामंडित करने का प्रयास किया गया । फिल्म लगान का इसमे उल्लेखनेय योगदान है । आज सारे लोग उस काले अध्याय को भूल चुके है । लेकिन यह बन्द हुआ है या नही इसका कोई प्रमाण नही है ।
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